कपाट का नाम प्रेम नहीं

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कपाट का नाम प्रेम नहीं
कपाट का नाम प्रेम नहीं

कपाट का नाम प्रेम नहीं

बंगाल में एक गांव था,जहां सूट कातने वाले बुनकर रहते थे। एक दिन एक शाक भाजी बेचने वाली स्त्री एक बुनकर के घर आयी , क्योंकि बुनकर की स्त्री से उसका बड़ा प्रेम था।बुनकर की स्त्री आनंदपूर्वक सूत कातती जाती थी और गीत भी गाते जाती थी। शाकवाली  के आने पर वह प्रसन्न होकर उसके लिए कुछ भोजन पानी ले अंदर गयी । उसके अंदर जाने पर शाक वाली को वहां रखी सूत  की रंग लछिया देख कर लालच आ गया ।सोचा- क्यों ना एक लच्शी  ले लू ,    पता थोड़े ही चल पाएगा।उसने चोरी से एक रंगदार लच्शी उठाकर अपने बगल में दबा ली।तभी उसकी सहेली अल्पाहार  ले आई, उसे कलेवा कराया । लेकिन देखा कि एक लच्शी  लापता है।वह समझ गई कि इतने कम समय में भला और कौन उठा सकता है?

तब उसने एक युक्ति सोची। अपनी उस सहेली से कहा- ‘बहना ! इतने दिनों बाद तो तुम मिली हो, क्यों ना इस हर्ष में हम दोनों थोड़ा नाच लें।’ लगी दोनों नाचने। पर शाक वाली अपने हाथ नीचे किए ही नाच रही थी।तब सहेली ने कहा- ‘ऐसे भी कहीं नाचते ? हाथ ऊपर करके नाचने का आनंद और ही है।’ विवश होकर शाकवाली  ने हाथ उठाया तो, पर केवल बाया हाथ ऊपर उठाया, दाहिना  नीचे ही रखा। इस पर सहेली ने कहा-‘ देखो, मेरे दोनों हाथ ऊपर है। पर तो एक ही हाथ उठाकर नाचतती  हो!’शाकवाली  ने कहा’ सखी! यह तो अपनी- अपनी रीत है। जिसको जैसा आता है, वैसा ही नाचती है। मुझे ऐसा ही नाचना आता है, और उसने चोरी खुल जाने के डर से दूसरा हाथ ऊपर नहीं उठाया। परमहंस रामकृष्ण देव यह कथा सुनकर कहते थे-‘ फिर हमारा प्रेम कहां रहा? यह तो धोखेबाजी है। एक हाथ में लालच छिपाए दूसरे हाथ से राम- नाम का कीर्तन करते हुए, हम भगवान का प्रेम कैसे पा सकते हैं? छल और प्रेम एक साथ नहीं रह सकते । पढ़ाई करते समय मन खेल में रहे तो पढ़ाई कैसी?

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