कश्मीर आज तक क्या भुगत रहा है

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कश्मीर आज तक क्या बीत रहा है
कश्मीर आज तक क्या बीत रहा है

कश्मीर के हिंदु राजा हरि सिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरू को थप्पड़ भी मारा था पूरी कहानी पढ़िए आप लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केसर नहीं लगा बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरि सिंह 987 के दरमियान जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्लाह इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्लाह महाराजा हरि सिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को बढ़ाना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की गहरी दोस्ती प्रसिद्ध थी जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते थे वहां बिना इजाजत के राजा हरि सिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरू ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं राजा हरि सिंह ने कहा चाहे आप कोई भी हो बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाए नेहरू ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरि सिंह ने गुस्से में आकर नेहरू को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा कि तुम्हारी कांग्रेश नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगी वही होगा तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय आप ने सैनिकों को कहकर जम्मू की सीमा के बाहर फेंक दिया कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वे 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बिठाकर ही रहेगा लेकिन इसके इसलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का हिस्सा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने लिया था सरदार पटेल ने सभी रास्तों को मिलाया लेकिन नेहरू में एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 95 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा नहीं यह परिस्थितियां नहीं आई कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके इस प्रकार इस पत्र को प्रधानमंत्री ने ठुकरा दिया था और उसका खामियाजा आज तक भारत भुगत रहा है

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